
ओंकारेश्वर/खंडवा।
ओंकारेश्वर स्थित वर्षों पुरानी राजपूत धर्मशाला एवं भोजनशाला पर प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर विवाद गहरा गया है। समाजजनों का कहना है कि जिस भवन ने वर्षों तक श्रद्धालुओं और जरूरतमंदों की सेवा की, उसे अचानक “अनाधिकृत” और “अवैध अतिक्रमण” घोषित कर ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू करना कई गंभीर कानूनी और संवैधानिक प्रश्न खड़े करता है।
समाज का दावा है कि संबंधित संपत्ति लंबे समय से धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों के लिए उपयोग में है तथा इससे जुड़े अभिलेख और सक्षम प्राधिकारी के पूर्व आदेश उपलब्ध हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2007 के आदेश के बाद लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन अब अचानक भवन को अवैध बताकर हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
समाजजनों ने संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300A का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक संस्थाओं के अधिकार, समानता और विधिक प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि किसी प्रकार का विवाद है तो उसका समाधान न्यायालय और कानून के अनुसार होना चाहिए, न कि अंतिम न्यायिक निर्णय से पहले भवन को अवैध घोषित कर ध्वस्त करने की कार्रवाई की जाए।
उनका कहना है कि यह केवल एक भवन का मामला नहीं, बल्कि उन हजारों श्रद्धालुओं और यात्रियों की आस्था से जुड़ा विषय है, जिन्होंने वर्षों तक इस धर्मशाला और भोजनशाला की सेवाओं का लाभ लिया है।
समाज ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि धार्मिक एवं सामाजिक धरोहर की रक्षा और न्यायपूर्ण प्रक्रिया की मांग के लिए है। साथ ही उन्होंने विश्वास जताया कि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से सत्य सामने आएगा और न्याय मिलेगा।





